483-मंदिर-मस्जिद
हिन्दू कहता चाहे कुछ हो,
मंदिर यहीं बनाएँगे|
मुल्लाओं का कौल यही है,
मस्जिद नहीं गिराएँगे|
लालबुझक्कड बनते हो,
क्या इतना मुझे बताएँगे?
पूंछा है क्या राम-रहीम से,
वे रहने भी क्या आएंगे?
क्या इतने पैसे वाले हो,
कि उसको घर दिलवाएँगे?
महंगाई के इस आलम में,
फिर खुद कैसे खाएँगे?
खून खराबे, राग, द्वेष से,
रब्बा को भरमाएंगे?
ढ़ोर गमर्रे जिद करते हैं,
उस पर रौब जमाएंगे|
मौला तो रहता उस दिल में,
जिसमें प्रेम भरा होता|
नफरत के कालीनों पर तो,
उसका घाव हरा होता|
क्या तुम ठेकेदार राम के,
या अल्ला के पैरोकार?
लड़ना होगा खुद लड़ लेंगे,
तुमको है क्या सारोकार?
मेरा मंदिर, उसकी मस्जिद,
यह कैसी दाबेदारी?
जीवन की सच्ची दौलत है,
बस उसकी ताबेदारी|
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