484-ता-ता-थईया
दुनियाँ के बाज़ार में खड़ा मैं,
और मेरा मन,
दग्ध भी है, स्तब्ध भी|
कि यहाँ हर चीज बिकाऊ ही नहीं,
है आसानी से उपलब्ध भी|
यहाँ रंग-रूप, नीति-रीति,
सभी कुछ तो क्रीत है|
अगर कुछ भी यहाँ गुम है,
गधे के सिर सींग की तरह,
तो वह आपस की प्रीत है|
आज रुपईया ही भैया है,
रुपईया ही बापू और मैया|
जिसकी भी जेब में रुपईया है,
वह सदी के महानायक से भी,
बिकवा सकता सेवइयाँ है|
यहाँ तक कि,
खुद की बहू के साथ भी,
करवा सकता ता-ता-थईया है|
अच्छा एक बात और,
जो मैंने इसमें देखी|
रुपईया घमंडी भी है,
इसलिए बघारता रहता है शेख़ी|
उसे पता है कोई भी मानव,
नहीं कर सकता है,
उसकी अनदेखी|
इसकी एक और अदा है,
यह कभी इस हाथ में है,
तो दूसरे हाथ दूसरे पल है|
क्योंकि चंचला का यह बेटा,
अत्यधिक चंचल और चपल है|
पता नहीं बुजुर्ग क्यों कहा करते थे,
कि रुपया हाथ का मैल है|
मुझे तो लगता है यह कुछ,
खास किस्म के लोगों की रख़ैल है|
यदि रुपया हाथ का मैल होता,
तो हाथों हाथ लिए जाने पर,
हाथों को मैला होते देखा तो नहीं|
रुपया कितना भी गंदा, मुड़ा-तुड़ा,
कटा-फटा या फिर नकली हो,
आज तक किसी ने,
फेंका तो नहीं|
हाँ मैल से रुपये का,
इतना संबंध तो अवश्य है|
कि यह पैदा कर देता,
मन में मैल और दिलों में,
वैमनस्य है|
आप चाह कर भी रुपये से,
दूर नहीं रह सकते|
आप कितने भी,
बली और कर्मठ हों,
अपने भुजबल के मद में,
चूर नहीं रह सकते|
शायद दो वक्त की रोटी देदे,
आपकी कर्मपरायणता,
और आपका भुजबल|
पर स्विश बैंक में खाते,
खुलवा सकता है केवल छल-बल|
यदि आप चाहते हैं,
आपके पास रुपयों का ढेर हो|
तो सुनिश्चित करें आपके द्वारा,
घपले हों, घोटाले हों, अंधेर हो|
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