१२-उंगली भर
वे ही,
मानव शरीर
के,
इतने
महत्वपूर्ण अंग को,
‘उंगली’ ‘भर’
कहते हैं|
जो सारा
जीवन,
इसी उंगली के
इशारों पर,
नाच किया
करते हैं|
अब आप ही
कहिये,
क्या होता,
जो उँगलियाँ
न होतीं?
गिनने में,
असुविधा तो
होती ही होती,
उंगली पकड़
कर,
चलने वालों
को भी दुविधा होती|
ऐसे लोग बुरी
तरह,
छटपटाते|
जिन्हें आदत
है बेबजह करने की,
पर कर न
पाते|
न वे टेढी कर
पातीं,
न ही सीधी
से,
घी ही निकाल
पातीं|
फिर कैसे
कुम्हड़े की बतियाँ,
तर्जनी देख
मुर्झातीं?
जिनके बिना
पंजे की कल्पना ही,
थी बेमानी|
फिर कांग्रेस
कैसे कर पाती,
मनमानी?
नाखून भी
कैसे उगते,
जो न होता
पंजा?
किसी को कोई
डर ही न होता,
चाहे बालों
वाला होता,
या होता गंजा
|
अंगूठा
बेचारा,
जिंदगी भर
रहता क्वांरा|
मंगनी का
छल्ला,
फिरता मारा
मारा|
फिन्गर
प्रिंट के अभाव में,
चोर कैसे
पकड़ते?
धुंए के
छल्ले कैसे उड़ाते,
सिगरेट कहाँ
जकड़ते?
बगीचे के
एकांत कोने में,
प्रेमी-प्रेमिका
आपस में,
क्या फंसाते?
बच्चों के
पेट में,
गुदगुदी कर
कर के,
उन्हें कैसे
हंसाते?
धार्मिक
कृत्यों में,
हवन कैसे
करते?
सरकारी पैसे
का,
बिना दस्तखत,
गबन कैसे
करते?
बीबी के पकाए
बेस्वाद खाने की,
झूठी तारीफ़
कैसे कर पाते,
बिना
उंगलियां चाट कर खाए?
कैसे अपनी
मासूमियत,
सिद्ध करते,
बिना
उंगलियां चटखाए?
तबला,
सारंगी, सितार, हारमोनियम,
भी तो न हम
बजा पाते|
और यदि ऐसा
होता तो,
हम सब
कर्णप्रिय संगीत से,
महरूम रह
जाते|
कवियों की
कल्पना,
कोरी कल्पना
ही रह जाती|
उसको मूर्त
कैसे करते,
जब लंबी पतली उँगलियों के बिना,
रूपसियों की,
खूबसूरती ही
ढह जाती|
शाहजहां कैसे
हुकुम सुनाता,
उंगलियां काट
ली जाएँ,
ताजमहल बनाने
वालों की|
और हम कैसे
जान पाते,
स्वार्थपरता
और निष्ठुरता,
राजमहल में
रहने वालों की?
पोरों का
क्या होता,
बेचारे अनाथ
हो जाते|
आज की इस
मंहगाई में,
कहाँ,
अपना ठिकाना
बनाते?
