साहित्य चर्चा :
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Tuesday, 25 September 2012
साहित्य चर्चा : 504-बयाना चुनावी सभा से जब कुछ लोग,नेताजी के भाषण...
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504-बयाना चुनावी सभा से जब कुछ लोग,नेताजी के भाषण...: 504-बयाना चुनावी सभा से जब कुछ लोग , नेताजी के भाषण से पहले ही , जाने लगे | तो नेताजी गुमास्तों पर , बलबलाने लगे | एवं श्रोता...
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साहित्य चर्चा : 437-बड़ा महत्व है कविता में दोहे का,धातुओं में लो...
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437-बड़ा महत्व है कविता में दोहे का,धातुओं में लो...: 437-बड़ा महत्व है कविता में दोहे का , धातुओं में लोहे का , और नाश्ते में , पोहे का , बड़ा महत्व है | शादी में दूल्हे का , र...
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साहित्य चर्चा : 484-ता-ता-थईयादुनियाँ के बाज़ार में खड़ा मैं,और म...
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साहित्य चर्चा : 483-मंदिर-मस्जिद हिन्दू कहता चाहे कुछ हो,मंदिर यह...
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साहित्य चर्चा : 468-मेरा बचपन, मेरा गाँवकाश! फिर से लौट आता,मेरा ...
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468-मेरा बचपन, मेरा गाँवकाश! फिर से लौट आता,मेरा ...: 468-मेरा बचपन , मेरा गाँव काश! फिर से लौट आता , मेरा बचपन , मेरा गाँव | बन वही नन्हा सा बालक , झुँझलाता दिखलाता ताव | घर के प...
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Monday, 24 September 2012
420-चकबस्त
अपने सिर आई,
दूसरों के सिर डालने के,
एक दूसरे की टांग खींचने,
मीन-मेख निकालने के,
आज-कल, आज-कल कह कर,
बात टालने के,
साँपों को दूध पिलाकर,
आस्तीनों मे नाग पालने के,
और उन्हें जुल्फें समझ कर,
हरदम हाथों से सम्हालने के,
हम अभ्यस्त हो गए हैं|
सरकार के हर काम की,
खिल्ली उड़ाने में,
सरकारी पार्टियों में फोकट की ,
मदिरा चढाने में,
सरकार द्वारा आबंटित
धन पर दाँत गढ़ाने में,
पकड़े जाने पर सबको,
उल्टी पट्टी पढ़ाने में,
वोट पाने के लिए,
क़ौमों को लड़ाने में,
हम व्यस्त हो गए हैं|
जब तब की,
किन्तु, परंतु, ताकि से,
सत्ता बचाए रखने के,
गुणा, जोड़ बाकी से,
हर हफ्ते लाल सावधानी,
जारी होने की झांकी से,
हिंदुस्तान के खिलाफ बढ़ती,
चीन की चालाकी से,
निराशा जगाने वाले,
राष्ट्रीय खेल हाकी से,
हम ध्वस्त हो गए हैं|
नित नए उजागर होते,
घोटालों की मार से,
विपक्ष और सरकार की,
रोज होने वाली तकरार से,
जंतर मंतर से हर चौथे महीने,
अन्ना की हुंकार से,
डालर के मुक़ाबले रुपया
गिरने के आसार से,
आतंकवादियों को भारत को,
सौंपने के पाकिस्तान के इंकार से,
हम पस्त हो गए हैं|
इठला कर किए गए,
माशूका के निहोरों से,
समय समय पर प्राप्त तोहफे,
अपने पराये औरों से,
पुलिस द्वारा ढूंढ निकाले गए,
आतंकवादियों के ठौरों से,
बार बार होने वाले,
नेताओं के दौरों से,
अपने किए गए नए पुराने,
वायदों को निभाने के ज़ोरों से,
हम आश्वस्त हो गए हैं|
असलियत छुपाने के लिए,
ओढ़े गए लवादों से,
चुनाव जीतने के लिए
किए गए लुभावने वायदों से,
भविष्य में होने वाले बताए गए,
संभावित फ़ायदों से,
आय कर में लागू होने वाले,
तरह तरह के कायदों से,
रोज रोज होने वालीं,
मनमोहक कवायदों से,
हम विश्वस्त हो गए|
Friday, 21 September 2012
504-बयाना
चुनावी सभा से जब कुछ लोग,
नेताजी के भाषण से पहले ही,
जाने लगे|
तो नेताजी गुमास्तों पर,
बलबलाने लगे|
एवं श्रोता एकत्रित करने पर,
खर्चे पैसों का रौब दिखाने लगे|
गुमास्ते ने सफाई दी,
सर आप अपना भाषण शुरू कीजिये,
और उन लोगों को जाने दीजिये|
जरूरी है उनका यहाँ से जाना|
क्योंकि उन्होने लिया है,
दूसरी पार्टी वालों से भी बयाना|
दो ट्रक और मँगवाए हैं|
गरीबों की बस्ती में भी,
पैसे भिजवाए हैं|
Sunday, 16 September 2012
437-बड़ा महत्व है
कविता में दोहे का,
धातुओं में लोहे का,
और नाश्ते में,
पोहे का,
बड़ा महत्व है|
शादी में दूल्हे का,
रसोई में चूल्हे का,
और शरीर में,
कूल्हे का,
बड़ा महत्व है|
पूजा में चंडी का,
रेल में झंडी का,
और बाज़ार मे,
मंडी का,
बड़ा महत्व है|
मंदिर में घंटी का,
गले में कंठी का,
और रिश्ते मे,
आंटी का,
बड़ा महत्व है|
दोस्तों में हर्ष का,
मार्केट में पर्स का,
और अस्पताल में,
नर्स का,
बड़ा महत्व है|
जेल में जेलर का,
व्यापार में सेलर का,
और फिल्मों में,
ट्रेलर का,
बड़ा महत्व है|
जानवरों में नसल का,
घी-तेल में असल का,
और खेती में,
फसल का,
बड़ा महत्व है|
सवारी में रिक्शा का,
शाला में शिक्षा का,
और दान मे,
भिक्षा का,
बड़ा महत्व है|
शब्जियों में आलू का,
भोजन में ब्यालू का,
और बिहार में,
लालू का,
बड़ा महत्व है|
रोगों में रतौंध का,
चिपकाने में गोंद का,
और नेताओं में,
तोंद का,
बड़ा महत्व है|
जीवन में होनी का,
गहनों में सोनी का,
और खिलाड़ियों में,
धोनी का,
बड़ा महत्व है|
तिथियों में चौथ का,
इन्सानों में मौत का,
और औरतों में,
सौत का,
बड़ा महत्व है|
संगीत में गाने का,
दंड में हरजाने का,
और गालियों में,
ताने का,
बड़ा महत्व है|
पक्षियों में तोते का,
बच्चों में पोते का,
और शुभ कर्मों में,
नौंते का,
बड़ा महत्व है|
Wednesday, 12 September 2012
484-ता-ता-थईया
दुनियाँ के बाज़ार में खड़ा मैं,
और मेरा मन,
दग्ध भी है, स्तब्ध भी|
कि यहाँ हर चीज बिकाऊ ही नहीं,
है आसानी से उपलब्ध भी|
यहाँ रंग-रूप, नीति-रीति,
सभी कुछ तो क्रीत है|
अगर कुछ भी यहाँ गुम है,
गधे के सिर सींग की तरह,
तो वह आपस की प्रीत है|
आज रुपईया ही भैया है,
रुपईया ही बापू और मैया|
जिसकी भी जेब में रुपईया है,
वह सदी के महानायक से भी,
बिकवा सकता सेवइयाँ है|
यहाँ तक कि,
खुद की बहू के साथ भी,
करवा सकता ता-ता-थईया है|
अच्छा एक बात और,
जो मैंने इसमें देखी|
रुपईया घमंडी भी है,
इसलिए बघारता रहता है शेख़ी|
उसे पता है कोई भी मानव,
नहीं कर सकता है,
उसकी अनदेखी|
इसकी एक और अदा है,
यह कभी इस हाथ में है,
तो दूसरे हाथ दूसरे पल है|
क्योंकि चंचला का यह बेटा,
अत्यधिक चंचल और चपल है|
पता नहीं बुजुर्ग क्यों कहा करते थे,
कि रुपया हाथ का मैल है|
मुझे तो लगता है यह कुछ,
खास किस्म के लोगों की रख़ैल है|
यदि रुपया हाथ का मैल होता,
तो हाथों हाथ लिए जाने पर,
हाथों को मैला होते देखा तो नहीं|
रुपया कितना भी गंदा, मुड़ा-तुड़ा,
कटा-फटा या फिर नकली हो,
आज तक किसी ने,
फेंका तो नहीं|
हाँ मैल से रुपये का,
इतना संबंध तो अवश्य है|
कि यह पैदा कर देता,
मन में मैल और दिलों में,
वैमनस्य है|
आप चाह कर भी रुपये से,
दूर नहीं रह सकते|
आप कितने भी,
बली और कर्मठ हों,
अपने भुजबल के मद में,
चूर नहीं रह सकते|
शायद दो वक्त की रोटी देदे,
आपकी कर्मपरायणता,
और आपका भुजबल|
पर स्विश बैंक में खाते,
खुलवा सकता है केवल छल-बल|
यदि आप चाहते हैं,
आपके पास रुपयों का ढेर हो|
तो सुनिश्चित करें आपके द्वारा,
घपले हों, घोटाले हों, अंधेर हो|
Tuesday, 4 September 2012
483-मंदिर-मस्जिद
हिन्दू कहता चाहे कुछ हो,
मंदिर यहीं बनाएँगे|
मुल्लाओं का कौल यही है,
मस्जिद नहीं गिराएँगे|
लालबुझक्कड बनते हो,
क्या इतना मुझे बताएँगे?
पूंछा है क्या राम-रहीम से,
वे रहने भी क्या आएंगे?
क्या इतने पैसे वाले हो,
कि उसको घर दिलवाएँगे?
महंगाई के इस आलम में,
फिर खुद कैसे खाएँगे?
खून खराबे, राग, द्वेष से,
रब्बा को भरमाएंगे?
ढ़ोर गमर्रे जिद करते हैं,
उस पर रौब जमाएंगे|
मौला तो रहता उस दिल में,
जिसमें प्रेम भरा होता|
नफरत के कालीनों पर तो,
उसका घाव हरा होता|
क्या तुम ठेकेदार राम के,
या अल्ला के पैरोकार?
लड़ना होगा खुद लड़ लेंगे,
तुमको है क्या सारोकार?
मेरा मंदिर, उसकी मस्जिद,
यह कैसी दाबेदारी?
जीवन की सच्ची दौलत है,
बस उसकी ताबेदारी|
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