1- सलीबें (एक जमीनी हकीकत)
आज हम खुद
की सलीबें ढो रहे हैं,
बजह, हम अपने सलीके खो रहे हैं|
बास जिनके
बदन से आती लहू की,
फिर भी
उनकी ही कमीजें धो रहे हैं|
बिछ
गलीचों से गए जिनके लिए हम,
हमसफर
कांटे नुकीले बो रहे हैं|
नाचना आता
नहीं जिनको ज़रा भी,
टेढ़े आँगन
की दलीलें रो रहे हैं|
बारहा जिन
पर भरोसा कर रहे थे,
डूबने
वाले सफीने “वो” रहे हैं|
अब तो
धूमिल कांच भर ही रह गए हैं,
सबकी
नज़रों में नगीने जो रहे हैं|
कर रहा
आगाह तुमको इसलिए हूँ,
हर गली
में नाग काले सो रहे हैं|
जो हमें
ठुकरा रहे हैं “छत्र पाल”,
क्यों
उन्हीं की हम कनीजें हो रहे हैं?
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