Friday, 31 August 2012


468-मेरा बचपन, मेरा गाँव
काश! फिर से लौट आता,
मेरा बचपन, मेरा गाँव|
बन वही नन्हा सा बालक,
झुँझलाता दिखलाता ताव|
घर के पिछवाड़े खड़ा वह,
नीम बूढ़ा गीत गाता|
झूमता मस्ती में अपनी,
दादा के किस्से सुनाता|
मेरे दादाजी के दादा,
ने इसे रोपा यहाँ था|
और फिर जाने से पहले,
दादी को सौंपा कहा था|
पाँचवाँ बेटा है मेरा,
पेड़ भर न जानना|
खाद-पानी से सगे,
बेटों सा इसको पालना|
देखना इक दिन यह बिरवा,
जब सघन हो जाएगा|
मेरे बेटों के भी बेटों,
को सुकूं पहुंचाएगा|
जेठ की तपती दुपहरी,
में घनेरी इसकी छांव|
राहतें पहुंचाएगी,
जो भी बैठे इसकी ठाँव|
काश! फिर से लौट आता,
मेरा बचपन, मेरा गाँव|

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