Thursday, 23 August 2012


2-बुलावा (एक जमीनी हकीकत)

मौत ने इक दिन कहा सपने में आ कर,
मैं तुझे आई हूँ लेने, सामना कर|

काम सारे पूरे कर ले, जो बचे हों,
अन्यथा ले जांयगे, तुझको उठा कर|

जिस्म ने छोड़ा पसीना, ढेर सारा,
फिर भी घूरा मौत को, आँखें नचा कर|

धौंस रुतबे की, चमक पैसे की फेंकी,
जाल फेंका, कीमती गहने दिखा कर|

पेशकश गाड़ी की, झांसा बंगले का,
भी दिया औरत समझ कर, पास जा कर|

मौत भी अपनी तरह की, एक ही थी,
ना डरी, सहमी न बोली, ताव खा कर|

प्यार से सुनती रही, बकवास मेरी,
हंस के बोली, पीठ मेरी थपथपा कर|

मौत बिकने इस तरह, जिस दिन लगेगी,
सृष्टि को धनवान, रख देंगे जला कर|

टूटती दिखने लगी जब, मेरी आशा,
गिड़गिड़ाया, भीख दे, देवी दया कर|

अबतलक देखा ही क्या, पाया ही क्या है?
और कुछ दिन लूं मैं जी, नेहा लगा कर|

ठीक है लेजा तूं मौक़ा, चार दिन का,
पाप कितने कर चुका है, यह बता कर|

और कुछ ज्यादा समय यदि चाहिए तो,
बस गिना जा काम अच्छे, कुल मिला कर|

हो गया तैयार चलने मौत के संग,
मौत के कदमों से लिपटा, लड़खड़ा कर||

No comments:

Post a Comment