2-बुलावा (एक जमीनी हकीकत)
मौत ने इक
दिन कहा सपने में आ कर,
मैं तुझे आई
हूँ लेने, सामना कर|
काम सारे
पूरे कर ले, जो बचे हों,
अन्यथा ले जांयगे,
तुझको उठा कर|
जिस्म ने
छोड़ा पसीना, ढेर सारा,
फिर भी घूरा
मौत को, आँखें नचा कर|
धौंस रुतबे
की, चमक पैसे की फेंकी,
जाल फेंका,
कीमती गहने दिखा कर|
पेशकश गाड़ी की,
झांसा बंगले का,
भी दिया औरत
समझ कर, पास जा कर|
मौत भी अपनी
तरह की, एक ही थी,
ना डरी, सहमी
न बोली, ताव खा कर|
प्यार से
सुनती रही, बकवास मेरी,
हंस के बोली,
पीठ मेरी थपथपा कर|
मौत बिकने इस
तरह, जिस दिन लगेगी,
सृष्टि को
धनवान, रख देंगे जला कर|
टूटती दिखने
लगी जब, मेरी आशा,
गिड़गिड़ाया,
भीख दे, देवी दया कर|
अबतलक देखा
ही क्या, पाया ही क्या है?
और कुछ दिन
लूं मैं जी, नेहा लगा कर|
ठीक है लेजा
तूं मौक़ा, चार दिन का,
पाप कितने कर
चुका है, यह बता कर|
और कुछ
ज्यादा समय यदि चाहिए तो,
बस गिना जा
काम अच्छे, कुल मिला कर|
हो गया तैयार
चलने मौत के संग,
मौत के कदमों
से लिपटा, लड़खड़ा कर||
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